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जुलाई 31, 2010 / Still Mind Project

क्या दादा लेखराज को प्रजापिता ब्रह्मा कह सकते हैं?

दुनिया का जो भी व्यक्ति ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ा है, या उनके किसी आश्रम या कार्यक्रम में गया है, या फिर उनके साहित्य का अध्ययन कर चुका है, वह यह जानता होगा कि ब्रह्माकुमारी संस्था के संस्थापक दादा लेखराज को उस संस्था के सदस्यों द्वारा प्रजापिता ब्रह्मा माना जाता है। उस संस्था द्वारा प्रकाशित त्रिमूर्ति शिव के चित्र को तो लगभग सभी ने देखा ही होगा। ब्रह्माकुमारियों के अनुसार परमपिता शिव परमात्मा 5000 वर्ष के मनुष्य सृष्टि चक्र के अंत में अर्थात् वर्तमान पुरुषोत्तम संगमयुग में ब्रह्मा (उर्फ दादा लेखराज) द्वारा नई दुनिया की स्थापना करते हैं, शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश करते हैं और विष्णु अर्थात् लक्ष्मी-नारायण द्वारा आने वाली नई दैवी दुनिया की पालना करते हैं। इस चित्र में भक्तिमार्गीय ब्रह्मा के स्थान पर दादा लेखराज को दिखाया गया है, किंतु सन् 1969 में दादा लेखराज के देहावसान के बाद, लगभग 37 वर्ष बीत जाने पर भी उन्हें यह पता नहीं है कि दादा लेखराज की तरह इस संगमयुग में शंकर या विष्णु की भूमिका कौन अदा करते हैं।

त्रिमूर्ति के चित्र में शंकर और विष्णु का पार्ट इस मनुष्य सृष्टि रंगमंच पर कौन अदा करते हैं, उसकी बात छोड़‍ए। कम से कम, पहले हमें यह तो पता होना चाहिए कि वास्तव में ब्रह्माकुमारियाँ जिस ब्रह्मा की बात करती हैं, वह ब्रह्मा कौन है? क्या ब्रह्मा और प्रजापिता ब्रह्मा एक ही हैं? क्या दादा लेखराज केवल ब्रह्मा हैं या प्रजापिता ब्रह्मा? दुनिया भर की ब्रह्माकुमारियाँ यह मानती हैं कि उनके ब्रह्मा बाबा अर्थात् दादा लेखराज सन् 1969 से सूरज, चाँद, सितारों से पार स्थित सूक्ष्म वतन में सूक्ष्म शरीरधारी के रूप में निवास कर रहे हैं, किंतु ब्रह्माकुमारियों द्वारा प्रकाशित दिनांक 18.06.05, पृ.2 के अंत की रिवाइज्ड ज्ञान मुरली, जो दादा लेखराज के शरीर से निराकार शिव ने सुनाई थी, में कहा गया है : ”प्रजापिता तो यहाँ होना चाहिए ना, नहीं तो कहाँ से आए? बाप खुद समझाते हैं, मैं पतित शरीर में आता हूँ। ज़रूर इनको ही प्रजापिता कहेंगे, सूक्ष्मवतन में नहीं कहेंगे। वहाँ प्रजा क्या करेगी?” इससे यह सिद्ध होता है कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर प्रजापिता ब्रह्मा का वास्तविक पार्ट अदा करने वाली आत्मा इसी मनुष्य सृष्टि पर एक पतित तन में प्रैक्टिकली मौजूद होनी चाहिए।

ब्रह्माकुमारी संस्था का यह भी मानना है कि सन् 1969 से निराकार शिव और अपना शरीर त्याग चुके दादा लेखराज की आत्मा हर वर्ष पूर्वनिर्धारित दिनों में ब्र.कु.दादी गुलज़ार के तन में प्रवेश कर अव्यक्त वाणी चलाती है। गुलज़ार दादी जी बचपन से ही एक पवित्र ब्रह्माकुमारी है, जबकि ऊपर उल्लिखित ज्ञान मुरली में शिव स्वयं कह रहे हैं कि मैं तो पतित शरीर में आता हूँ। ब्रह्माकुमारियों द्वारा ही प्रकाशित रिवाइज्ड ज्ञान मुरली दिनांक 15.10.69 पृ.2 मध्‍य में कहा गया है—”इतना ऊँच बाप है तो उनको तो राजा अथवा पवित्र ऋषि के तन में आना चाहिए। पवित्र होते ही हैं सन्यासी। पवित्र कन्या के तन में आवे; परन्तु कायदा नहीं है। बाप सो फिर कुमारी पर कैसे सवारी करेंगे? बाप बैठ समझाते हैं कि मैं किसमें आता हूँ। मैं तो आता ही समें हूँ जो कि पूरे 84 जन्म लेते है, एक दिन भी कम नहीं।” इससे यह सिद्ध होता है कि शिव बाप ब्र.कु.गुलज़ार दादी, जो कि एक पवित्र कन्या है, के तन में नहीं आते हैं। निराकार शिव द्वारा दादा लेखराज ब्रह्मा के मुख से जो ज्ञान मुरलियाँ सुनाई गई थीं उसका पाँच साल का रिकार्ड उपलब्ध है, जिसे वे अपने आश्रमों में हर पाँच साल में एक बार रिवाइज़ करते हैं। अत: 15.10.69 की उक्त मुरली को जब 21.11.05 को ब्रह्माकुमारियों द्वारा रिवाइज़ किया गया तो उसमें से ”पवित्र कन्या के तन में आवे; परन्तु कायदा नहीं है। बाप सो फिर कुमारी पर कैसे सवारी करेंगे?”—शब्दों को काट दिया गया है, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि शिव बाप गुलज़ार दादी जी के तन में आते हैं। जबकि दादा लेखराज के मुख से सन् 1951 से 1969 तक सुनाई गई ज्ञान मुरलियाँ और गुलज़ार दादी जी के मुख से सन् 1969 से अब तक सुनाई गई अव्यक्त वाणियाँ इस बात की ओर इशारा देती है कि त्रिमूर्ति शिव का साकार मनुष्य के रूप में प्रैक्टिकल पार्ट इसी सृष्टि पर कहीं और चल रहा है।

वास्तव में, दादा लेखराज ब्रह्मा के द्वारा निराकार शिव ने मुखवंशावली ब्राह्मण वत्सों की रचना के लिए सन् 1969 तक केवल बेहद की माँ का पार्ट अदा किया और सन् 1976 से राम और कृष्ण की जन्मभूमि, शिव-शंकर भोलेनाथ की कर्मभूमि तथा पतितपावनी गंगा के लिए प्रसिद्ध उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक गाँव कम्पिल से किसी साधारण, पतित, अनुभवी मनुष्य शरीर रूपी रथ में प्रवेश कर गुप्त रूप से प्रजापिता ब्रह्मा अर्थात् पिता का पार्ट अदा कर रहे हैं और सच्चा गीता ज्ञान और राजयोग सिखा रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की है, किंतु ब्रह्माकुमारी संस्था के सरपरस्त ज्ञान की तीसरी आँख से उस साधारण रथ द्वारा सुनाई जा रही शिव की असाधारण वाणी को समझने के स्थान पर पौराणिक शास्त्रों में प्रसिद्ध कहानियों की तरह ईश्वरीय कार्य में बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं तथा त्रिमूर्ति शिव की ही श्रीमत का उल्लंघन करते हुए दुनिया भर में त्रिमूर्ति शिव के स्थान पर स्वयं को प्रत्यक्ष कर रहे हैं। दुनिया को विनाश की चेतावनी देने वाले स्वयं संपत्तियाँ तथा सुख के साधन एकत्रित करने में लगे हुए हैं। वे अपने ऊपर परमपिता शिव की छत्रछाया को सिद्ध करने के लिए शिव की वाणी में ही उपरोक्त उदाहरण की तरह परिवर्तन कर रहे हैं, जो शायद दुनिया के किसी धर्मग्रंथ में नहीं होता होगा।

महाभारत कथा में भी प्रसिद्ध है कि महाभारत युद्ध से पहले बहुसंख्यक कौरवों ने श्रीकृष्ण से उनकी अक्षौहिणी सेना और संपत्ति माँग ली तथा अल्पसंख्यक पांडवों ने श्रीकृष्ण का केवल साथ ही माँग लिया। जीत किसकी हुई, यह तो सब जानते हैं। विनाश काले प्रीतबुद्धि विजयंति तथा विनाशकाले विपरीतबुद्धि विनश्यंति।

आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय

मकान नं. 351/352, ब्लाक ए, फेस-1

विजयविहार , रिठाला , दिल्ली – 110085

फोन नं. 011-27044227 , 27044152

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जुलाई 31, 2010 / Still Mind Project

बापू जी का रामराज्य

यह बात तो सर्वविदित है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तथा आज़ादी के बाद भी, अपनी प्रार्थना सभाओं का प्रारंभ ‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम’ के प्रार्थनागीत से करते थे। उन्होंने तथा लाखों ज्ञात एवं अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत में रामराज्य की स्थापना के लिए अपने तन, मन और धन की बाजी लगा दी। उनके अथक प्रयासों और गुमनाम बलिदानों से हमें अंग्रेजों से आज़ादी तो मिली; लेकिन दुर्भाग्यवश हम देह अभिमान तथा उससे उत्पन्न होने वाले पाँच विकारों के गुलाम होते चले गए और रामराज्य लाने की बात तो दूर, हमने भारत में रावण राज्य ज़रूर स्थापन कर लिया है।

बापू जी के सपनों का भारत आज वैसा नहीं है, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी। आज भी सीताओं का हरण होता है, आज भी शुभ कार्यों रूपी यज्ञ में दुष्ट व्यक्तियों रूपी राक्षसों द्वारा विघ्न पैदा किए जाते हैं। तो क्या कलियुग रूपी रावण राज्य बापू के रामराज्य में कभी तब्दील नहीं हो सकता है? ज़रूर हो सकता है; लेकिन उसके लिए हमें बेहद के बापू अर्थात् परमपिता परमात्मा को पहचानकर उसकी श्रीमत पर चलना होगा।

ये जो बेहद के बापू हैं, उन्हें भारत के बापू जी भी ‘पतित पावन सीता राम’ के रूप में याद करते थे और ये जो पतित-पावन सीता-राम हैं, वो कोई केवल भारत के या हिन्दुओं के भगवान या माई-बाप नहीं, अपितु सारे विश्व के मात-पिता हैं। इन्हें भारत में आदि देव, आदि देवी तथा आदिनाथ के रूप में तथा विदेशों में आदम-हव्वा या एडम-ईव के रूप में याद किया जाता है। भारत के बापू ने अंतिम साँस तक हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने की कोशिश की, किंतु वे मृदुल स्वभाव के होने के कारण भारत के विभाजन को रोक नहीं पाए और अपने ही देश के किसी धर्मांध व्यक्ति की गोली के शिकार हुए, किंतु विश्व के बापू न केवल हिन्दुओं और मुसलमानों को, अपितु सभी धर्मों, भाषाओं, राष्ट्रों की आत्माओं को एक सूत्र में बाँधते हैं, जिसकी यादगार वह माला है, जिसे सभी धर्मों की आत्माएँ जपती हैं।

सारे विश्व को एक सूत्र में बाँधने का आसान तरीका भी यह है कि हम स्वयं को यह नाग रूपी शरीर न समझ कर, मस्तकमणि ज्योति बिंदु आत्मा समझें। आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। जब आत्मा शरीर में रहते हुए शरीर के भान से न्यारी होती है—जैसे कि छोटे बच्चे धर्म या देहभान से न्यारे होते हैं—तो आत्मा पावन, गुणवान होती है। जब 5000 वर्ष पहले सभी भारतवासी आत्माभिमानी थे तो भारत में रामराज्य था; लेकिन 2500 वर्ष पहले, जब भारत समेत सारे विश्व के मनुष्य देहअभिमानी बन गए, तो विश्व में रावण राज्य या शोक वाटिका स्थापित हो गई। अब पुरुषोत्‍तम संगमयुग में वह बेहद का बापू या राम अर्थात निराकार परमपिता परमात्मा शिव फिर से इस सृष्टि पर आकर रामराज्य स्थापन करने का ज्ञान तथा पतित से पावन बनने की कला अर्थात सहज राजयोग सिखा रहे हैं। यदि हम स्वयं को आत्मा समझ बेहद के बापू की श्रीमत पर चलेंगे तो भारत के बापू का सपना अर्थात् रामराज्य साकार हो सकेगा। खण्डित भारत फिर से अखण्ड देवभूमि बन सकेगा।

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जुलाई 29, 2010 / Still Mind Project

बौद्ध धर्म–मनुष्य सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष का तीसरा धर्म

यह मनुष्य सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष एक अनोखा वृक्ष है; क्योंकि इसका बीज परमपिता परमात्मा शिव नीचे इस सृष्टि पर नहीं, अपितु ऊपर शांतिधाम के रहवासी हैं। हम मनुष्य आत्माएँ भी उसी धाम से आकर इस धरती रूपी रंगमंच पर शरीर रूपी वस्त्र धारण कर 5000 वर्ष के चतुर्युगी सृष्टि-चक्र में अलग-अलग समय पर अलग-अलग भूमिकाएँ अदा करती हैं, 1 से 84 जन्म लेती हैं और पावन से पतित बनती रहती हैं। चूँकि निराकार परमपिता शिव जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते हैं, सदा पावन हैं और इस मनुष्य सृष्टिरूपी कल्प वृक्ष के बीज हैं, इसलिए उनमें इस सृष्टि के आदि, मध्य और अंत का ज्ञान समाया हुआ है, जो वे इस नाटक के अंत में अर्थात् पुरुषोत्तम संगमयुग पर प्रजापिता ब्रह्मा में परकाया प्रवेश कर हम पतित मनुष्यात्माओं को देते हैं और राजयोग के द्वारा पावन बनाते हैं। वे बता रहे हैं कि किस प्रकार इस सृष्टि-चक्र के आदि में अर्थात् सतयुग और त्रेतायुग में एक धर्म अर्थात् आदि सनातन देवी-देवता धर्म था और हम सभी मर्यादा पुरुषोत्तम देवी-देवताएँ थे। 2500 वर्ष पूर्व, द्वापरयुग में सबसे पहले पैगंबर इब्राहिम द्वारा इस्लाम धर्म की, फिर महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म की और फिर ईसा मसीहा द्वारा ईसाई धर्म की स्थापना की गई।

जिस प्रकार परमपिता परमात्मा शिव संगमयुग पर परकाया प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अन्य धर्मों के धर्मपिता भी परकाया प्रवेश करते हैं, किंतु परमात्मा जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है और अन्य धर्मपिताओं की आत्माएँ धर्म स्थापन करने के बाद पुनर्जन्म लेती हैं। जैसे आज से लगभग 2250 वर्ष पहले महात्मा बुद्ध की आत्मा परमधान से आकर सिद्धार्थ नामक शरीरधारी के तन में प्रवेश कर बौद्ध धर्म की स्थापना करती है। वह जिसमें प्रवेश करती है, वो आत्मा तो पहले से ही इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अनेक जन्म पार्ट बजा चुकी होती है। महात्मा बुद्ध की आत्मा जिस सिद्धार्थ के शरीर में प्रवेश करती है, उसे बौद्ध धर्म की आधारमूर्त आत्मा कहा जाता है, जबकि सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन को उस धर्म की बीज-रूप आत्मा कहा जाएगा। वह बीज-रूप आत्मा अपने जीवनकाल में अपने पुत्र के शरीर द्वारा स्थापित धर्म को अंगीकार नहीं करती है; लेकिन अगला जन्म बौद्धी के रूप में ही लेती है। इस बेहद के ड्रामा का यह नियम है कि जो भी आत्मा परमधाम से इस सृष्टि पर आकर जन्म लेती है, वह पहले जन्म में दुख-अशांति का अनुभव नहीं करती है, इसलिए नए धर्म की स्थापना में जो भी बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, उनका सामना ऊपर से आने वाली महात्‍मा बुद्ध की आत्मा नहीं, अपितु सिद्धा‍र्थ की आत्मा करती है।

शरीर छोड़ने के बाद महात्मा बुद्ध और सिद्धार्थ, दोनों ही आत्माएँ अलग-अलग नाम एंव रूप में, अलग-अलग स्थानों पर जन्म लेती हैं, किंतु दोनों ही बौद्धी धर्म की सहयोगी बनती हैं। इस प्रकार, पुनर्जन्म लेते-लेते कलियुग के अंत में अन्य आत्माओं की भांति दोनों ही पतित और विकारी बन जाती हैं। जब पुरुषोत्तम संगमयुग पर परमपिता परमात्मा आकर ईश्वरीय परिवार की स्थापना करते हैं, तो सिद्धार्थ और उनके पिता शुद्धोधन की आत्मा तो ब्रह्माकुमार या कुमारी बन कर ईश्वरीय ज्ञान को स्वीकार कर लेती हैं, किंतु महात्मा बुद्ध की आत्मा संगमयुग के लगभग अंतिम समय तक बौद्ध धर्म की पालना करती रहती है। जब संगमयुग के अंत में महाभारी महाभारत युद्ध की शुरुआत होती है तो महात्मा बुद्ध की आत्मा भी परमपिता परमात्मा शिव से सत्य ज्ञान की अंचली लेकर अपने धर्म के सभी अनुयायियों को भारत में भगवान के दिव्य अवतरण से अवगत कराती है।

बौद्ध धर्म की स्थापना तो भारत में हुई थी, किंतु यह धर्म भारत में अधिक समय तक पनप नहीं सका। इसका मुख्य कारण था, परमात्मा तथा देवी-देवताओं के संबंध में इसका मौन। इस धर्म में आत्मा-परमात्मा दोनों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया है। इसका विकास भारत की पूर्वी दिशा में स्थित देशों में हुआ। आरंभ में बौद्ध विहारों में केवल पुरुष भिक्षु ही रहते थे, किंतु बाद में, जब इन विहारों में स्त्री और पुरुष भिक्षु (सन्यासी) एक साथ रहने लगे, तब इस धर्म में नैतिक पतन प्रारंभ हो गया और भारत में इसका पतन आरंभ हो गया। इसके अतिरिक्त, बौद्ध धर्म की एक और विशेषता है—अहिंसा, किंतु इस अहिंसा के कारण ही मुट्ठी-भर विदेशी आक्रमणकारियों ने नालंदा और तक्षशिला-जैसे अति प्राचीन एवं प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को कुछ ही समय में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

अब इस संगमयुग पर परमपिता परमात्मा शिव आकर हमें सच्ची अहिंसा सिखाते हैं, हमें डबल अहिंसक बनाते हैं—एक तो, जो क्रोध रूपी हिंसा नहीं करते और दूसरे, जो काम विकार रूपी हिंसा भी नहीं करते। साथ ही, परमपिता परमात्मा शिव स्वयं इस भारत भूमि पर अवतरित होकर दो साधारण व्यक्तियों (प्रजापिता ब्रह्मा एवं जगदम्बा) द्वारा पवित्र प्रवृतिमार्ग स्थापित कर हमें घर-गृहस्थ में रहते हुए सच्ची पवित्रता सिखाते हैं—सन्यासियों वाली कायरतापूर्ण पवित्रता नहीं—जिससे कि हम नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बन सकें। सर्व धर्मों के पिता निराकार परमपिता परमात्मा शिव इस संगमयुग पर आकर हमें अपने चौरासी जन्मों की कहानी तथा देवता धर्म सहित सभी मुख्य धर्मों की स्थापना, पालना और विनाश की कहानी बताते हैं तथा प्राय:लोप हुए आदि सनातन देवी-देवता धर्म की पुन: सैपलिंग लगाते हैं।

संबंधित मुरली प्वाइंट्स :

1. ”बाप है मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का बीज रूप। सत्य है। वह कभी विनाश नहीं होता। इनको उल्टा झाड़ कहते हैं।” (मु.3.7.04 पृ.3 आ.)

2. ”कलकत्ते वाला बड़ कइयों ने देखा नहीं होगा। बहुत बड़ा झाड़ है। अब उनका फाउन्डेशन सारा सड़ गया है। बाकी झाड़ खड़ा है। यह भी ऐसे है। देवता धर्म का फाउन्डेशन है नहीं। (मनुष्य सृष्टि रूपी) झाड़ की भी अब जड़जड़ीभूत अवस्था है।” (मु.27.7.91 पृ.2 अं.)

3. ”बुद्ध की आत्मा ने प्रवेश किया, बुद्ध धर्म पहले तो होता नहीं। ज़रूर यहाँ के कोई मनुष्य में प्रवेश करेंगे। फिर गर्भ में तो ज़रूर जाएँगे। बुद्ध धर्म एक ने ही स्थापन किया फिर उनके पीछे और आते गए। फिर वृद्धि होती गई। जब लाखों हो जाते हैं, तो फिर राजाई चलती है। बौद्धियों का भी राज्य था। बाप समझाते हैं, यह सब पीछे आते हैं।” (मु.12.3.99, पृ.2 म.)

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जून 20, 2010 / Still Mind Project

क्या ईश्वर के ब्रह्म महावाक्यों में फेरबदल करना उचित है?

किसी भी धर्म के अनुयायी के लिए उसके धर्म का धर्मग्रंथ परम आदरणीय होता है। जैसे हिन्दुओं के लिए ‘गीता’, मुसलमानों के लिए ‘कुरान शरीफ़’, ईसाईयों के लिए ‘बाइबल’, बौध्द मतवलम्बियों के लिए ‘धम्मपद’, सिक्खों के लिए ‘गुरुग्रंथ साहब’ इत्यादि। कुछ धर्मों के अनुयायी तो अपने धर्मग्रंथ को भगवान का महावाक्य मानते हैं तथा उसको उद्धृत करते समय या उसका स्पष्टीकरण करते समय किसी भी गलती को अक्षम्य मानते हैं, किन्तु एक मत ऐसा भी है जहाँ ईश्वरीय महावाक्य कही जाने वाली ज्ञान मुरलियों को यथोचित सम्मान नहीं दिया जा रहा है।

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, जो कि संसार के सामने यह दावा करता है कि स्वयं परमपिता परमात्मा शिव ने ब्रह्माकुमारी संस्था के संस्थापक दादा लेखराज में प्रवेश कर ईश्वरीय ज्ञान सुनाया है, जिसे ज्ञान मुरलियाँ कहा जाता है। वास्तव में ये ज्ञान मुरलियाँ परमात्मा शिव ने दादा लेखराज के मुख द्वारा सन् 1951 से 18 जनवरी,1969 में उनके देहावसान तक अपने अलौकिक बच्चों के सम्मुख सुनाई थी। शुरुआत में ये बच्चे अपने हाथों से  मुरली नोट करते थे और अपने हाथों से ही इसकी कॉपियाँ बनाकर अन्य शहरों में रहने वाले ब्रह्माकुमार-कुमारियों को भेजते थे। बाद में इसे टाइप और साइक्लोस्टाइल करवा कर भेजा जाने लगा और अभी तो बकायदे मा.आबू की आफसेट प्रिंटिंग प्रेस में मनमाने तरीके से काटपीट कर सारे विश्व के सेवाकेन्द्रों में हज़ारों की तादाद में भेजी जा रही है, किन्तु ब्रह्माकुमारी संस्था में इस प्रकार टाइप की गई मुरलियों का अभिलेख केवल पाँच वर्षों का उपलब्ध है। सन् 1969 से, दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् ब्रह्माकुमारी संस्था के आश्रमों में प्रतिदिन प्राय: इन्हीं पाँच वर्ष की मुरलियों को पढ़ा जाता है तथा हर पाँच वर्ष बाद दोहराया जाता है।

ईश्वरीय वाणी होने के कारण ज्ञान मुरलियों को ब्रह्माकुमारियों द्वारा जितना सम्मान दिया जाना चाहिए उतना नहीं दिया गया है। दादा लेखराज के समय भी जब मुरलियाँ हाथ से लिखकर सबको भेजी जाती थी, तब भी इनमें फेरबदल होता था, जिसका परमपिता शिव ने स्वयं एक मुरली में उल्लेख किया है। दिनांक 8.3.92 पृ.2 की रिवाइज्‍़ड मुरली के अनुसार – मुरली लिखना अच्छी सर्विस है, सब खुश होंगे, आशीर्वाद करेंगे। बाबा अक्षर बहुत अच्छे हैं। नहीं तो लिखते हैं - अक्षर अच्छे नहीं। बाबा हमको वाणी कट करके भेज देते हैं। हमारे रतनों की चोरी हो जाती है। बाबा हम अधिकारी हैं - जो आपके मुख से रतन निकलते हैं वह सब हमारे पास आने चाहिए। यह कहेंगे भी वही जो अनन्य होंगे।

जब दादा लेखराज के जीवन काल में ही मुरलियों में फेरबदल होता था, तो फिर उनके शरीर छोड़ने के पश्चात् यदि इस फेरबदल में तेजी आ जाए यानी सैकड़ों मुरलियों, अव्यक्त वाणियों के महावाक्यों में कटिंग या फेरबदल कर दिया जाए तो इसमें क्या आश्चर्य है?

सन् 1969 के बाद, हर पाँच साल के पश्चात् जब ब्रह्माकुमारी संस्था के माउंट आबू स्थित मुख्यालय में इन ज्ञान मुरलियों को रिवाइज़ किया जाता है तो उस समय कुछ तो अनजाने में गलतियाँ हो जाती हैं और कुछ जानबूझकर फेरबदल किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, इसका एक ज्वलन्त प्रमाण है – दिनांक 20.11.88 तथा 21.11.93 की मुरली, जिसमें सन् 1969 के बाद, परमपिता शिव के नए शारीरिक माध्यम, विश्व के मालिक के स्थान के प्रति इशारे के रूप में उत्तर प्रदेश स्थित ‘फर्रुखाबाद’ का उल्लेख किया गया है। इस मुरली के अनुसार – मैं तो खुद मालिक हूँ। फर्रुखाबाद में मालिक को मानते हैं ना! तुमने मालिक का अर्थ भी समझा है। वह है मालिक, हम उनके बच्चे हैं। तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। बच्चे कहते हैं- हमारा बाबा। तो बाप के धन के तुम मालिक हो। इसी मुरली को जब  21.11.93 में रिवाइज़ किया गया, तब उपर्युक्त महावाक्य परमपिता शिव के नये पार्ट को छुपाने के लिए इस प्रकार बदल दिया गया – मैं तो खुद मालिक हूँ। मालिक को भी मानने वाले होते हैं; परन्तु उनसे पूछना चाहिए कि तुमने मालिक का अर्थ समझा है? इस प्रकार इस मुरली में फर्रुखाबाद के उल्लेख को काट दिया गया। वास्तव में फर्रुखाबाद में स्वयं परमपिता शिव द्वारा स्थापित आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विकास को रोकने के लिए ही ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा  ईश्वरीय महावाक्यों के साथ फेर-बदल किया जा रहा है। यह अत्यंत दुखद बात है।

ईश्वरीय महावाक्यों अर्थात् ज्ञान मुरलियों के महत्व को रेखांकित करते हुए ब्र.कु.गुल्ज़ार दादी के तन से दादा लेखराज की आत्मा द्वारा सुनाई गई दिनांक 23.10.75 की अव्यक्त वाणी में बताया गया है – मुरली है लाठी, इस लाठी के आधार से कोई कमी भी होगी तो वह भर जावेगी। …… तो लगन से मुरली पढ़ना व सुनना अर्थात् मुरलीधर की लगन में रहना। मुरलीधर से स्नेह की निशानी मुरली है।  जितना मुरली से स्नेह है उतना ही समझो मुरलीधर से भी स्नेह है। सच्चे ब्राह्मण की परख मुरली से होगी। मुरली से लगन अर्थात् सच्चा ब्राह्मण। मुरली से लगन कम अर्थात् हाफकास्ट ब्राह्मण।

कई ब्रह्माकुमार-कुमारियों द्वारा ज्ञान मुरलियों और अव्यक्त वाणियों में दी गई श्रीमत का उल्लंघन तो होता ही है, किन्तु इन ज्ञान मुरलियों में ही फेरबदल करना उस परमपिता शिव के प्रति घोर अनादर का सूचक है। जब आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सदस्यों द्वारा इन्हीं ज्ञान मुरलियों में परमपिता शिव के बदले हुए स्थान एवं शरीर के प्रति इशारे देने वाले महत्वपूर्ण रेखांकित महावाक्यों को ईश्वरीय संदेश के पर्चों के रूप में दिया जाता है, तो कई ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ क्रोधित होकर इन्हें फाड़ देते हैं या अपने पाँव तले कुचल देते हैं। यह वैसा ही है, जैसे प्राचीन भारत के इतिहास में विदेशी आक्रमणकारियों ने अत्यंत मूल्यवान शास्त्रों को नष्ट कर दिया था और तब से ही भारत का पतन होता चला आया है। औरंगजेब के शासनकाल में भी भारतीय शास्त्रों को भाड़ में भून दिया जाता था, जमीन में खुदाई करके गाड़ दिया जाता था और नदियों में  फाड़ कर फेंक दिया जाता था। इसी प्रकार वर्तमान संगमयुगी शूटिंग काल में भी तथाकथित ब्रह्माकुमार-कुमारियों द्वारा ईश्वरीय महावाक्यों के रूप में मुरलियों को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले मुस्लिम आक्रांताओं की शूटिंग करने सम्बन्धी सैकड़ों प्रमाण मिल रहे हैं।

इसके अतिरिक्त परमपिता परमात्मा शिव ने ब्रह्मा बाबा के मुख से कई वर्ष जो मुरलियाँ चलाई थीं, उसे टैपरिकार्ड में टैप करके भी रखा जाता था; चूँकि वह सारी की सारी सैकड़ों की तादाद में चलाई गई मुरलियों की रिकार्डिंग परमपिता शिव की वाणियों का हूबहू पक्का प्रमाण थी; परंतु ब्रह्मा उर्फ कृष्ण के भक्त की तरह मुखिया बी.केज़ ने त्रिमूर्ति शिव की प्रथम मूर्ति ब्रह्मा का देहावसान होने के बाद, कृष्ण उर्फ ब्रह्मा के साथ ही अपना प्रभाव बरकरार रखने के लिए, शिव की सर्वोपरि मूर्ति महादेव शंकर (राम) की प्रत्यक्षता को रोकने के लिए, ब्रह्मा मुख से रिकार्ड की गई सारी कैसेटों को नेस्तनाबूद कर दिया और सिर्फ काट-छाँट की हुई 2/4 कैसेटें ही दिखावा करने लिए बची रह गईं, जो अभी माँगने पर जिज्ञासुओं को दे दी जाती हैं।

यही हाल ब्रह्माकुमारी आश्रम में छपाये गए सबसे पुराने 30×40” के त्रिमूर्ति, झाड़, ल.ना., सीढ़ी आदि चित्रों का भी हुआ। ये चित्र ब्रह्मा बाबा ने संदेशियों के द्वारा हुए साक्षात्कार के आधार पर बार2 करैक्शन करके तैयार कराए थे और हज़ारों की तादाद में छपाए थे। यही नहीं, अंग्रेजी और गुजराती में भी इन बड़े2 चित्रों की कापियाँ छपाई गई थीं। जैसे ही सन् 76 में एडवांस पार्टी के द्वारा इन चार पुराने चित्रों पर महादेव शंकर की तीसरी मूर्ति के प्रत्यक्ष होने की बात उजागर हुई, तो अचानक ये सारे ही पुराने चित्र ब्रह्माकुमारी आश्रमों से या तो गायब कर दिए गए या नष्ट कर दिए गए। ब्रह्मा बाबा के शरीर छोड़ने के बाद ईश्वरीय ज्ञान को लेकर इतना बड़ा फ्राड करके जन सामान्य को गुमराह करने वाली संस्था लगभग समूचे विश्व के हर छोटे-बड़े शहर, गाँव2 में कैसे व्याप्त हो गई – यह बड़े ही आश्चर्य की बात है! इस प्रश्न का एकमात्र जवाब यही दिया जा सकता है कि दुष्कर्म करने वालों के द्वारा वर्तमान महापापी कलियुग अंत की शूटिंग में भी पापाचार, भ्रष्टाचार का बोलबाला होता ही है, जिसका विनाश करने के लिए कलियुग अंत में कलंकीधर भगवान को अवतार लेना ही पड़ता है। यह 5000 वर्ष पूर्व की भांति श्रीमद्भगवत्गीता प्रसिध्द ”विनाशाय च दुष्कृताम्” का ईश्वरीय कार्य अभी फिर से जारी है।

ओमशांति

आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय

मकान नं. 351/352, ब्लाक ए, फेस-1

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जून 20, 2010 / Still Mind Project

ब्रह्माकुमारियों द्वारा अंधश्रध्दायुक्त भक्तिमार्ग की रिहर्सल- 2

ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा दुनियाभर में, मंदिरों तथा सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाने वाली चित्र प्रदर्शनियों में यह समझाया जाता है कि हम यह शरीर नहीं, अपितु आत्माएँ हैं तथा 5000 वर्ष के चतुर्युगी मनुष्य सृष्टि चक्र में चौरासी जन्म लेते हैं। पहले दो युगों में अर्थात् सतयुग और त्रेतायुग में अविनाशी सुख-शांति होने के कारण कोई भक्ति नहीं होती और केवल एक धर्म अर्थात् आदि सनातन देवी-देवता धर्म होता है। सभी सर्व गुण सम्‍पन्न देवी-देवताएँ होते हैं; किंतु हिन्दू शास्त्रों में किये गये उल्लेखानुसार न तो वहाँ कोई राक्षस होते हैं और न ही उनके विनाश के लिए भगवान का अवतरण होता है; किंतु जब द्वापरयुग में स्वयं को देह समझने के कारण दुख-अशांति का प्रारंभ होती है, तब भक्ति प्रारंभ होती है।

द्वापरयुग में आरंभ हुए भक्तिमार्ग के प्रारंभिक चरणों में भारतवासी शिवलिंग या शंकर की नग्न मूर्तियों के रूप में पूजा करते थे; किंतु, बाद में उन्होंने सतयुग तथा त्रेतायुग के अपने ही पवित्र स्वरूप अर्थात् युगल रूप में देवी-देवताओं की भक्ति प्रारंभ कर दी, जैसे- शंकर-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, राधा-कृष्ण, राम-सीता इत्यादि की पूजा। कलियुग के प्रारंभ के साथ ही हिन्दुओं ने केवल देवी या केवल देवता की, सिंगल पूजा शुरू कर दी, जैसे केवल कृष्ण की, शंकर की, इत्यादि। फिर मानव एवं पशु के मिश्रित रूप (जैसे हनुमान, गणेश, नरसिंह आदि) तथा निर्जीव वस्तुओं (पत्थरों, पेड़ों) के रूप में भगवान की पूजा की जाने लगी। जिन देवी-देवताओं की भक्ति करते थे, उन्हें जल में विसर्जित भी करने लगे ( जैसे देवी दुर्गा, गणेश)। द्वापर और कलियुग में, 63 जन्मों से की जा रही भक्ति का लक्ष्य तो सुख-शांति प्राप्त करने का था; किंतु अव्यभिचारी भक्ति के स्थान पर व्यभिचारी भक्ति करने के कारण न तो इससे अविनाशी सुख-शांति की प्राप्ति हुई, न ज्ञान मिला और न भगवान। गीता में भी लिखा हुआ है कि यज्ञ, जप, तप, पूजा इत्यादि से भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती।

जब कलियुग अंत में भक्ति पूर्णतया तमोप्रधान हो जाती है, धर्म के नाम पर अधर्म फैल जाता है, मनुष्यों का नैतिक पतन हो जाता है, तब निराकार परमपिता परमात्मा शिव को स्वयं इस धरती पर अलौकिक अवतरण लेना पड़ता है। वे माँ के गर्भ से नहीं, अपितु किसी साधारण वृध्द, अनुभवी मनुष्य (जिसका कर्त्‍तव्‍यवाचक नाम प्रजापिता ब्रह्मा है) के शरीर में प्रवेश कर हमें भक्ति का फल, ज्ञान देते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से ईश्वरीय ज्ञान सुनाकर वे एक ईश्वरीय ब्राह्मण परिवार की स्थापना करते हैं, जो कि बाद में ब्रह्माकुमारी संस्था का रूप ले लेता है। जब तक ब्रह्माकुमारी संस्था के संस्थापक दादा लेखराज (उर्फ ब्रह्मा बाबा) जीवित थे, निराकार परमपिता शिव उनके मुख से नित्य ज्ञान और राजयोग की शिक्षा के द्वारा ब्रह्माकुमार-कुमारियों की पालना करते थे। पुरुषोत्तम संगमयुग में परमपिता शिव द्वारा प्रारंभ किये गए इस ज्ञानमार्ग में भक्तिमार्ग की किसी रसम-रिवाज़ का अंशमात्र भी नहीं था।

जैसे किसी भी ड्रामा या नाटक का वास्तविक मंचन होने से पहले उसकी तैयारी या रिहर्सल की जाती है, उसी प्रकार 5000 वर्ष के इस नाटक की रिहर्सल 100 वर्ष के पुरुषोत्तम संगमयुग में की जाती है। जैसे उस विशाल नाटक में 2500 वर्ष बाद, द्वापरयुग से भक्तिमार्ग प्रारंभ होता है, उसी प्रकार संगमयुग में सन् 1969 में दादा लेखराज के देहावसान के बाद निराकार परमपिता शिव के बदले हुए साकार व्यक्तित्व एवं स्थान को न पहचान पाने के कारण ब्रह्माकुमारी संस्था में भी सूक्ष्म एवं स्थूल रूप में भक्ति की रिहर्सल आरंभ हो जाती है।

संगमयुग के प्रारंभ में ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ प्रजापिता (सेवकराम की आत्मा) या ब्रह्मा (दादा लेखराज) के द्वारा एक परमपिता शिव को ही याद करते थे। यह थी द्वापरयुग में शिवलिंग या शंकर के रूप में एक शिव की पूजा करने की रिहर्सल; किंतु सन् 1969 में ब्रह्मा बाबा के देहावसान के पश्चात् ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ अपने आश्रमों और घरों में ब्रह्मा (दादा लेखराज) एवं मम्मा (सरस्वती) के चित्र प्रदर्शित करके शिव को याद करने लगे। यह थी द्वापरयुग के पूर्वार्ध्द में युगल रूप में देवी-देवताओं की भक्ति की रिहर्सल; किंतु कुछ वर्षों बाद कई ब्रह्माकुमारी आश्रमों में केवल ब्रह्मा (दादा लेखराज) तथा ज्योतिर्बिंदु शिव के चित्र प्रदर्शित किये जाने लगे। यह थी द्वापरयुग के उत्तरार्ध्द में सिंगल देवताओं के मंदिर बनवाए जाने की यादगार। ब्रह्मा बाबा के देहावसान के कई वर्षों बाद आम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ इस ईश्वरीय परिवार में देहधारी गुरु बन बैठे दादी, दीदी व अन्य वरिष्ठ ब्रह्माकुमार-कुमारियों को अधिक महत्व देने लगे। इसलिए ब्रह्माकुमारी आश्रमों में इन देहधारी गुरुओं के भी चित्र प्रदर्शित किये जाने लगे, जबकि परमपिता शिव ने तो दादा लेखराज (ब्रह्मा) के भी चित्र प्रदर्शित करने से सख्त मना किया है। अब तो परिस्थिति इतनी खराब हो गई है कि ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा लाखों या करोड़ों रुपये खर्च करके आयोजित किये जा रहे कार्यक्रमों में त्रिमूर्ति शिव और ब्रह्मा-सरस्वती के चित्र भी प्रदर्शित नहीं किये जा रहे हैं। पर्चों, बैनरों, निमंत्रण-पत्रों इत्यादि में केवल वर्तमान प्रशासिकाओं अर्थात् दादियों के चित्र प्रदर्शित किये जा रहे हैं। निस्संदेह इन दादियों ने अपने लौकिक परिवार का त्याग कर लंबे समय से ईश्वरीय सेवा की है; किंतु इस संस्था के वास्तविक संस्थापक त्रिमूर्ति शिव या ब्रह्माकुमारियों द्वारा माता-पिता माने जाने वाले ब्रह्मा-सरस्वती को दरकिनार करके इन दादियों का प्रचार करना एक स्वस्थ परंपरा नहीं है। कुछ ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ तो कतिपय वरिष्ठ ब्रह्माकुमार-कुमारियों से इतना स्नेह करते हैं कि उन्हें परमपिता शिव से अधिक महत्व देते हैं। यह वास्तव में द्वापरयुग एवं कलियुग में विभिन्न देवी-देवताओं, गुरुओं और निर्जीव वस्तुओं की पूजा करने की रिहर्सल है। उक्त शूटिंग या रिहर्सल जानबूझकर नहीं की जाती है; लेकिन इस बेहद के नाटक में कुछ आत्माओं द्वारा अपनी भूमिका अदा करते-करते स्वत: हो जाती है। इसलिए इस शूटिंग की उक्त जानकारी का लक्ष्य किसी आत्मा-विशेष की भूमिका की निंदा करना नहीं है।

संगमयुग में, ईश्वर द्वारा स्थापित ज्ञानमार्ग में ईश्वरीय परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा भक्तिमार्ग की शूटिंग या रिहर्सल का ज्ञान भी स्वयं परमपिता शिव ही देते हैं; किंतु किसी और स्थान (कंपिल, उत्तर प्रदेश) एवं मनुष्य शरीर के द्वारा, जिसका कर्त्‍तव्‍यवाचक नाम रखा जाता है-‘शंकर’। इस सच्चे गीता ज्ञान के सार को समझकर कई ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ पाण्डवों की भांति परमपिता शिव की परिवर्तित भूमिका को पहचान रहे हैं। जब सभी ब्रह्माकुमार-कुमारियों को इस ज्ञानमार्ग में चल रही भक्ति से वैराग्य आ जाएगा और वे कमल पुष्प समान घर-गृहस्थ में रहते हुए साकार में आये निराकार ईश्वर की याद से प्राप्त शक्तियों के आधार पर ज्ञान को धारण करेंगे, तो फिर देहधारी गुरुओं या देवी-देवताओं के रूप में भक्तिमार्गीय शूटिंग करने वाले ब्रह्माकुमार-कुमारियों का विसर्जन हो जाएगा तथा इस धरती पर एक धर्म, एक रामराज्य, एक भाषा और एक मत वाले स्वर्ग की स्थापना हो जाएगी।

ओम शांति

आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय

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जून 20, 2010 / Still Mind Project

ब्रह्माकुमारियों द्वारा अंधश्रध्दायुक्त भक्तिमार्ग की रिहर्सल-1

ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा आम जनता को यह समझाया जाता है कि 5000 वर्ष के चतुर्युगी मनुष्य सृष्टि चक्र में मनुष्यात्माएँ चौरासी जन्म लेती हैं। पहले दो युगों में अर्थात् सतयुग और त्रेतायुग में कोई भक्ति नहीं होती; किंतु द्वापरयुग में देहभान के कारण, दु:ख-अशांति प्रारंभ होने पर, भक्ति प्रारंभ होती है। मंदिर बनाकर, शिवलिंग के रूप में शिव की, मूर्तियों/चित्रों के रूप में देवी-देवताओं की और बाद में जड़ वस्तुओं या पेड़-पौधों और जानवरों के रूप में भी भक्ति की जाती है। ईश्वर तथा सुख-शांति की प्राप्ति के लिए यज्ञ, जप, तप, तीर्थ यात्राएँ, गंगा स्नान, दान-पुण्य आदि करते हैं। द्वापर और कलियुग में, 63 जन्मों से की जा रही भक्ति का लक्ष्य तो सुख-शांति प्राप्त करने का था, किंतु अव्यभिचारी भक्ति के स्थान पर व्यभिचारी भक्ति करने के कारण, न तो अविनाशी सुख-शांति की प्राप्ति हुई, न ज्ञान मिला और न भगवान। गीता में भी लिखा हुआ है कि यज्ञ, जप, तप, पूजा इत्यादि से भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

जब कलियुग अंत में भक्ति पूर्णतया तमोप्रधान हो जाती है, धर्म के नाम पर अधर्म फैल जाता है, मनुष्यों का नैतिक पतन हो जाता है, तब निराकार परमपिता परमात्मा शिव को स्वयं इस धरती पर अलौकिक अवतरण लेना पड़ता है। वे माँ के गर्भ से नहीं, अपितु किसी साधारण वृध्द, अनुभवी मनुष्य (प्रजापिता ब्रह्मा) के तन में प्रवेश कर हमें भक्ति का फल ज्ञान देते हैं। उनके मुख से ईश्वरीय ज्ञान सुनाकर वे एक ईश्वरीय ब्राह्मण परिवार की स्थापना करते हैं, जो कि बाद में ब्रह्माकुमारी संस्था का रूप ले लेता है। इस संस्था के संस्थापक दादा लेखराज के जीवित रहने तक, पुरुषोत्तम संगमयुग में परमपिता शिव द्वारा प्रारंभ किये गए इस ज्ञानमार्ग में भक्तिमार्ग की किसी रसम-रिवाज़ का अंशमात्र भी नहीं था।

जैसे किसी भी नाटक का मंचन होने से पहले उसकी तैयारी या रिहर्सल की जाती है, उसी प्रकार 5000 वर्ष के इस नाटक तथा भक्तिमार्ग की रिहर्सल 100 वर्ष के पुरुषोत्तम संगमयुग में की जाती है। रामायण, महाभारत आदि की रिहर्सल भी इसी संगमयुग में ब्रह्माकुमार-कुमारियों के परिवार में होती है। पाण्डव, कौरव, यादव भी यहीं होते हैं। इस ईश्वरीय परिवार में दो प्रकार के सदस्य होते हैं। एक तो वो जिनकी भक्ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है तथा वे केवल ज्ञान तथा भगवान की याद के द्वारा आध्यात्मिक साधना करने में व्यस्त रहते हैं; किंतु कुछ सदस्य, जिनकी भक्ति पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई होती है, वे सन् 1969 में, दादा लेखराज के देहावसान के बाद इस ज्ञानमार्ग में भी अंधी भक्ति के बीज बोते रहते हैं। सन् 1969 के बाद निराकार परमपिता शिव के बदले हुए साकार व्यक्तित्व एवं स्थान को न पहचान पाने के कारण ब्रह्माकुमारी संस्था के ये सदस्य भक्तिमार्ग की तरह ज्ञानमार्ग में भी देहधारियों के चित्र प्रदर्शित करने, भगवान को भोग लगाने, गीत सुनने-सुनाने, आध्यात्मिक साधना के लिए मंदिरों जैसा वातावरण सृजित करने, ब्रह्माकुमारी संस्था के विभिन्न आश्रमों में तीर्थ यात्राएँ करने-कराने, वरिष्ठ ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों की भक्तिमार्गीय गुरुओं की तरह सेवा करने, कलियुगी मंदिरों की तरह खुले आम दान लेने आदि का कार्य करने लग पड़ते हैं, जो कि स्वयं परमपिता शिव द्वारा दादा लेखराज (उर्फ ब्रह्मा बाबा) के मुख से सुनाई गई ज्ञान मुरलियों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है; किंतु ज्ञानमार्ग में भक्तिमार्गीय शूटिंग या रिहर्सल में उनका कोई दोष नहीं है।

जब ईश्वर द्वारा स्थापित अलौकिक परिवार में ही भक्तिमार्ग की शूटिंग की तमोप्रधान अवस्था हो जाती है, तब परमपिता शिव कंपिल, उत्तर प्रदेश से अपने नए शारीरिक माध्यम के द्वारा पहले इस अलौकिक परिवार (ब्रह्माकुमार-कुमारियों) को इस भक्ति से वैराग्य दिलाकर अति गुह्य सच्चा गीता ज्ञान देते हैं, जिससे वे इसी जन्म में नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी समान बन सकें। वर्तमान समय गुप्त एवं साधारण वेश में चल रहे परमपिता शिव के पार्ट को जो पहचान कर ईश्वरीय ज्ञान को जीवन में धारण करते हैं, वही सच्चे पाण्डव कहलाते हैं; जो परमपिता शिव के साकार पार्ट को जानते तो हैं, पर न मानते हैं और न उनकी श्रीमत पर चलते हैं, कौरव कहलाते हैं और जो इस ईश्वरीय संदेश को सुनकर भी अनसुना कर देते हैं, कलियुगी अल्पकालिक सुखों को भोगने में ही लगे रहते हैं, वे यादव कहलाते हैं अर्थात् जो परमपिता के साकार पार्ट को न जानते हैं, न मानते हैं और न चलते हैं।

ओम शांति

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जून 20, 2010 / Still Mind Project

माउंट आबू से ब्रह्मा द्वारा परमपिता शिव की श्रीमत और ब्रह्माकुमारियों द्वारा उसका उल्लंघन

माउंट आबू स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, जो कि दुनिया भर में ब्रह्माकुमारीज़ या ब्रह्माकुमारी संस्था के रूप में प्रसिध्द है, पिछले आधे दशक से भी अधिक समय से विश्व में यह प्रचार करता रहा है कि इसकी स्थापना स्वयं परमपिता शिव द्वारा एक सत्य धर्म तथा स्वर्ग या सतयुग की स्थापना के लिए की गई है। ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की जाती रही और अभी भी की जा रही है कि शीघ्र ही इस पुरातन जगत का विनाश और नई देवताई दुनिया की स्थापना होने वाली है। वे संसार को यह भी बताते हैं कि इस कार्य के लिए निराकार परमात्मा शिव ने सन् 1936-37 में सिंध हैदराबाद के दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा को चुना था, किंतु सन् 1969 में, दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् ब्रह्माकुमारी संस्था की कथनी और करनी में महान अंतर नज़र आने लगा है।

ब्रह्माकुमारियों द्वारा जिस निराकार परमपिता परमात्मा शिव को इस अलौकिक परिवार के वास्तविक संस्थापक के रूप में बताया जाता है, उसी के संबंध में सन् 1969 के बाद यह बताया जाता है कि वह वापस सूर्य, चंद्र और तारागण से पार अपने परमधाम चले गए हैं और कभी-कभी माउंट आबू में ब्र.कु.गुल्ज़ार दादी के तन में आकर ज्ञान सुनाते हैं, किंतु सोचिये कि क्या जिस प्रकार अन्य धर्मपिताएँ अपने-अपने समय पर आए और दुनिया में द्वैतवाद या अनेकता फैलाकर चले गए, उसी प्रकार परमपिता परमात्मा शिव भी इस सृष्टि पर अवतरित होकर एक सत्य सनातन देवी-देवता धर्म और सतयुग की स्थापना का कार्य अधूरा छोड़ कर चले जाएँगे?

वास्तव में, सन् 1969 में, दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् निराकार परमपिता परमात्मा शिव वापस शांतिधाम नहीं गए, अपितु त्रिदेवों में से ब्रह्मा की यादगार भूमि मानी जाने वाली राजस्थान को छोड़कर, विष्णु एवं महादेव शिव-शंकर की अवतरण भूमि मानी जाने वाली पुण्यभूमि उत्तर प्रदेश के एक छोटे ग्राम  कंपिला से गुप्त रूप से विश्व परिवर्तन का कार्य कर रहे हैं, जिसे महाभारत काल में पांडवों के लम्बे गुप्तवास का स्थान माना गया है।

दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा के साकार माध्यम के चले जाने के बाद उक्त गुप्तवास की जानकारी न होने के कारण और वर्तमानकालीन भगवान शिव-शंकर भोलेनाथ की प्रत्यक्ष पालना न मिलने के कारण, ब्रह्माकुमार-कुमारियों का यह परिवार मात-पिता विहीन हो गया और शनै: शनै: उस परिवार की परिस्थिति वही होती आई है, जो कि लौकिक दुनिया में माता-पिता के बिना अनाथ बच्चों की होती है। ब्रह्माकुमार-कुमारियों द्वारा उस श्रीमत का उल्लंघन करना प्रारंभ हो गया, जो कि निराकार भगवान शिव ने दादा लेखराज के द्वारा माउंट आबू से ज्ञान मुरली के रूप में उन्हें दी थी।

सन् 1976 में ग्राम कंपिला, उत्तर प्रदेश से प्रत्यक्ष हुए निराकार शिव के दूसरे साकार माध्यम के द्वारा उन्हीं ज्ञान मुरलियों या सच्ची गीता के स्पष्टीकरण से अलौकिक ईश्वरीय परिवार में कर्मों के आधार पर कौरव तथा पाण्डव रूपी भाइयों के चेहरे प्रत्यक्ष होते हैं। वैसे तो ब्रह्माकुमार-कुमारियों द्वारा सूक्ष्म रूप में कई प्रकार से श्रीमत का उल्लंघन किया जाता है, किंतु प्रत्यक्ष रूप में हो रहे श्रीमत के कई प्रकार के उल्लंघन के कारण संसार में अनावश्यक रूप से परमात्म परिवार और ज्ञान की ग्लानि होती  है।

1. परमपिता शिव की एक बड़ी श्रीमत है- ‘माँगने से मरना भला’। किंतु, ब्रह्माकुमारी संस्था के मुख्यालय समेत सभी ब्रह्माकुमारी आश्रमों में दान-पात्रों के रूप में अप्रत्यक्ष तथा प्रत्यक्ष रूप में ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों से धन या अन्य प्रकार की सहायता की याचना की जाती है, जो कि परमपिता शिव की उक्त श्रीमत का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। ब्रह्माकुमारी आश्रम के माउंट आबू स्थित मुख्यालय की तीर्थ यात्रा या किसी सार्वजनिक समारोह के नाम पर अधिकतर ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों से खुले आम चंदा माँगा जाता है। कई गरीब ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ मोटी रकम न जुटा पाने के कारण दादा लेखराज के समय ईश्वर की कर्मभूमि रही माउंट आबू की यात्रा करने से वंचित हो जाते हैं या उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल पाता।

बाबा ने ता.4.4.72 पृ.3 की मुरली में बोला है- ”माँगने से ब्रह्माकुमारियों को डूब मरना अच्छा है।”

”सेंटर्स पर जिज्ञासुओं से माँगते रहते हैं हमको यह चाहिए। बाबा हमेशा कहते हैं माँगो मत।  [...]  माँगना न है।” ( मु. 25.1.72 पृ. 2)

2. परमपिता शिव ने मुरलियों में श्रीमत दी है कि मुख्यालय माउंट आबू के अतिरिक्त कहीं भी ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्रों के लिए भवनों के निर्माण की आवश्यकता नहीं है, केवल किराये पर मकान लेते रहें और ईशरीय संदेश फैलाते रहें; क्योंकि नष्ट होने वाली इस पुरानी पतित दुनिया में संपत्ति बनाने का कोई अर्थ नहीं है, किंतु विश्व परिवर्तन की परमात्मा की इस घोषणा पर स्वयं विश्वास न होने के कारण सन् 1969 के बाद ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों द्वारा दुनिया भर में विशाल अचलसंपत्तियों का निर्माण होने लगा और आज ब्रह्माकुमारी संस्था की संपत्तियों को देखकर किसी भी व्यक्ति को यह विश्वास नहीं होगा कि इस कलियुगी सृष्टि का विनाश होने वाला है।

3. भगवान शिव द्वारा यह श्रीमत दी गई है कि दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा का फोटो या चित्र नहीं रखना चाहिए; क्योंकि देह तो नश्वर है, पाँच तत्वों का बना हुआ है, किंतु दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् दुनियाभर के ब्रह्माकुमारी आश्रमों में तथा ब्रह्माकुमार- कुमारियों के घरों में दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा और सरस्वती के चित्र देखे जा सकते हैं। अब तो सार्वजनिक आयोजनों के निमंत्रण-पत्रों में ब्रह्मा और सरस्वती के चित्रों के स्थान पर वर्तमान प्रशासिकाओं के चित्र छपने लगे हैं, जो कि श्रीमत का सरासर उल्लंघन है। वास्तव में परमपिता शिव का कहना है कि जीते-जागते मुकर्रर साकार शरीर रूपी रथ के द्वारा निराकार परमपिता को याद करना राजयोग की सही प्रक्रिया है, ठीक वैसे ही जैसे सोने की डिबिया में रखे हीरे को देखा जाता है; परन्तु ब्रह्माकुमारी आश्रमों में सिर्फ निराकार ज्‍योतिर्बिंदु की याद सिखाई जाती है। साकार में आये शिवशंकर भोलेनाथ के पार्ट को नजरअंदाज किया जा रहा है।

”इनका (ब्रह्मा का)  फोटो भी तुम मत रखो। कोई भी देहधारी (मम्मा, बाबा, दीदी, दादी आदि)  का फोटो नहीं रखना है।” ( मु. 27.3.86 पृ.1 )

”ब्रह्मा का नाम भी न लो। इसलिए बाबा-मम्मा का फोटो रखना भी पसन्द नहीं करते। कब-कब ख्‍याल आता है सभी फोटो निकाल दें। बाकी त्रिमूर्ति, झाड़ तो है ही। इनके द्वारा बाप पढ़ाते हैं। इनको थोड़े ही याद करना है। इनका फोटो तो कब लो नहीं। नहीं तो फँस मरेंगे। फोटो भी क्यों रखें? भक्त लोग अपने गुरु का चित्र रखते हैं। यह कोई गुरु थोड़े ही है।” (मु.8.3.69 पृ.3)

”बाबा समझते हैं इनमें अज्ञान है, जो फोटो के लिए जिद करते हैं।  [...] यह देह तो मिट्टी है। इनका फोटो क्या देखना है? भक्तिमार्ग की जो रसम है ज्ञानमार्ग में हो न सके।” (मु.13.11.70 पृ.2)

4. ब्रह्माकुमार-कुमारियों को यह श्रीमत भी मिली हुई है कि भगवान को भोग चढ़ाना भक्तिमार्ग की तरह है। ज्ञानमार्ग में इसकी आवश्यकता नहीं होती है। केवल भगवान की याद में शुध्द भोजन पकाना और भगवान की याद में भोजन परोसना या खाना ही पर्याप्त है, जिससे भोजन का शरीर पर अच्छा असर भी पड़ता है, किंतु ब्रह्माकुमारी आश्रमों में तथा उनको देखकर ब्रह्माकुमार-कुमारियों के घरों में भी आडंबरपूर्ण तरीके से भगवान को भोग चढ़ाया जाता है। भोग के नाम पर अनुयायियों से पैसे भी वसूले जाते हैं। शादी करके शारीरिक सुख का भोग करना या नश्वर शरीर का जन्मदिन मनाना इत्यादि ब्रह्माकुमारी आश्रम के सिध्दांतों के अनुसार नहीं है, किंतु अधिकतर ब्रह्माकुमारी आश्रमों में आए दिन शादी या जन्मदिन की खुशी में भगवान को भोग चढ़ाया जाता है। वास्तव में आत्मा तो अजर-अमर है, इसलिए उसे सदैव प्रसन्न होना चाहिए, न कि केवल एक दिन।

”यह भोग आदि तो न ज्ञान है, न योग है। इन बातों से कोई कनेक्‍शन नहीं है।” (मु.18.7.70 पृ.4)

5. निरहंकारी भगवान शिव द्वारा ज्ञान मुरलियों में घोषणा की गई है कि वो तो केवल एक ओबीडियेंट सर्वेंट है। दादा लेखराज के जीवित रहने तक ब्रह्माकुमारी आश्रमों में किसी को कोई ओहदा या पद-मान-मर्तबा नहीं मिला हुआ था, किंतु उनके देहावसान के पश्चात् इन आश्रमों के प्रशासकों तथा वरिष्ठ सदस्यों ने विभिन्न उपाधियाँ धारण कर ली हैं, जैसे- मुख्य प्रशासिका, सह प्रशासिका, निदेशक, निदेशिका, जोनल इन्चार्ज इत्यादि। यह उसी तरह है जैसे भक्तिमार्ग में तथाकथित मनुष्य गुरु परमपूज्य श्री श्री 108 जगद्गुरु शंकराचार्य या वाचस्पति, सरस्वती इत्यादि उपाधियाँ धारण कर लेते हैं। वास्तव में आध्यात्मिक साधना करने वालों को ऐसी उपाधियों की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

6. परमपिता शिव की श्रीमत के अनुसार ब्रह्माकुमारी आश्रम जिज्ञासुओं के लिए सारा दिन खुले होने चाहिए, ताकि कोई भी ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त कर सके, किंतु अधिकतर ब्रह्माकुमारी आश्रम दिन में आराम के नाम पर कई घंटों के लिए बंद कर दिये जाते हैं।

7. इसी प्रकार, भगवान शिव की श्रीमत है कि ब्रह्माकुमारी आश्रम धर्म, जाति, भाषा इत्‍यादि के भेदभाव के बिना सभी के लिए खुले होने चाहिए। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का अर्थ ही यह है कि यह सारे विश्व के लिए है, किंतु जैसे ही किसी ब्रह्माकुमारी आश्रम की संचालिका को पता चलता है कि किसी अनुयायी ने कंपिला, उत्तर प्रदेश स्थित आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिपादित शिव-शंकर भोलेनाथ के दिये हुये ज्ञान का श्रवण किया है, तो उन अनुयायियों को ब्रह्माकुमारी आश्रमों में प्रवेश करने पर रोक लगा दी जाती है तथा उन्हें पाण्डवों की तरह बहिष्कृत कर दिया जाता है। दुनिया के किसी भी धार्मिक स्थल में इस प्रकार अपने ही धर्म के अनुयायियों के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है। भारतीय संसद तथा भारत सरकार द्वारा आयकर में विशेष छूट तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा सस्ती दरों पर या मुफ्त जमीन प्राप्त करने वाली ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा अपने ही अनुयायियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार आश्चर्यजनक है।

8. आज तक जितने भी धर्म हुए हैं, उनके अनुयायियों द्वारा अपने धर्म ग्रंथ को परम आदर दिया जाता है, उसके साथ कोई छेड़- छाड़ नहीं की जाती है, किसी शब्द या वाक्य को काटा या संशोधित नहीं किया जाता है, किंतु बडे़ आश्चर्य की बात है कि दादा लेखराज के द्वारा सुनाई गई भगवान शिव की वाणी मानी जाने वाली ज्ञान मुरलियों में सन् 1969 से कई परिवर्तन किये गए हैं, विशेषकर फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश स्थित आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रगति को रोकने के दृष्टिकोण से। यह उन हज़ारों ब्रह्माकुमार-कुमारियों के लिए आश्चर्य ही नहीं, अपितु दु:ख का भी विषय है कि स्वयं भगवान शिव की वाणी के साथ छेड़छाड़ की जाती है। वास्तव में भगवान की यह वाणी विश्व की सारी आत्माओं के लिए पथ-प्रदर्शक है, अविनाशी सुख-शांति पाने का माध्यम है। अत: कुछ देहधारी गुरुओं द्वारा इसमें मनमत से संशोधन किया जाना एक दुखद बात है।

9. जब तक दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा बाबा जीवित थे, तब तक निराकार परमपिता शिव उनमें प्रवेश कर अपनी दिव्य दृष्टि से अपने सम्‍मुख बैठे अलौकिक बच्चों को आत्मानुभूति कराते थे, उनमें शक्तियाँ भरते थे। उनके जीवित रहने तक कोई अन्य ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ राजयोग के नाम पर अन्य ब्रह्माकुमार-कुमारियों को इस प्रकार दृष्टि नहीं देते थे, किंतु दादा लेखराज के निधन के बाद विश्वभर के ब्रह्माकुमारी आश्रमों में ब्रह्माकुमार- कुमारियों द्वारा अन्य ब्रह्माकुमार-कुमारियों को दृष्टि दी जाती है, जो कि गलत है; क्योंकि स्वयं पूरी तरह आत्माभिमानी न होने तथा उनमें परमपिता शिव की प्रवेशता न होने के कारण वे किसी को दृष्टि देकर पावन बना नहीं सकते। पतित आत्माओं के बीच इस प्रकार दृष्टि के लेन-देन से सूक्ष्म रूप में देहअभिमान बढ़ता है, न कि घटता है। वास्तव में निराकार भगवान के साकार जीवन्त माध्यम के द्वारा ही उस परमपिता को याद करना राजयोग की सही प्रक्रिया है।

”कोई से आँख मिलाई यह भी शैतान बने। आँखें मिलाने वालों की दिव्य चक्षु निकल जाती है।” (मु.2.5.73 पृ.2)

”यहाँ तो सच्‍चे साफ दिल चाहिए। ऐसे नहीं, घर छोड़ आकर फिर ब्राह्मण कुल में रह कोई न कोई से आँख लड़ाती रहो।” (मु.9.2.73 पृ.2)

”अक्सर करके स्त्री-पुरुष की तो विकार की दृष्टि होती है।  ……….. कोई तरफ कुदृष्टि जाये तो उसके आगे खड़ा भी नहीं होना चाहिए। एकदम चला जाना चाहिए।” (मु.28.1.90 पृ.1)

”ऐसे मत समझो यहाँ जो आते हैं उन्हों की विष से बुध्दि निकल जाती है। एक दो को देखते हैं तो अंदर तूफान चलता गंदे बनने लिए।” (मु.19.9.73 पृ.2)

10. परमपिता शिव की एक श्रीमत यह भी है कि ईश्वरीय सेवा अर्थात् दुनियावालों को आत्मा, परमात्मा तथा सृष्टि के आदि, मध्य  और अंत का ज्ञान देना तथा परमपिता परमात्मा शिव के दिव्य, किंतु गुप्त अवतरण का संदेश घर-घर तक पहुँचाने का कार्य कम से कम खर्चे में होना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का आडंबर या प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। किंतु, सन् 1969 में दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा इस लाभकारी और कल्याणकारी नियम का अनेकों बार उल्लंघन किया गया है। हाल के वर्षों में तो ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा लाखों या करोड़ों रुपये खर्च करके कई सार्वजनिक कार्यक्रम किये गए हैं, जिनके प्रचार के साधनों में परमपिता शिवशंकर भोलेनाथ के स्थान पर ब्रह्माकुमारी संस्था के संचालिकाओं के चित्रों का प्रचार और प्रदर्शन बड़े-बड़े पोस्टर बनाकर किया जा रहा है, जो कि एक दुखद विषय है।

11. परमपिता शिव की श्रीमत तथा ब्रह्माकुमारी संस्था का यह घोषित सिध्दांत है कि काम विकार महाशत्रु है, जैसा कि गीता में भी लिखा गया है – इंद्रियों पर विजय पाने से जगत पर विजय पाई जा सकती है। अत: जनसंख्या निमंत्रण के नाम पर कामेन्द्रियों के सुख को बढ़ावा देने वाले गर्भ निरोधक उपायों से इस संस्था का कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। परमपिता परमात्मा शिव द्वारा ब्रह्माकुमारी आश्रमों को रूहानी अस्पताल की संज्ञा दी गई है, किंतु ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा माउंट आबू में जो अस्पताल खोला गया है, वहाँ सरकारी नियमों के अनुसार गर्भ निरोधक साधन भी मिलते हैं, जो कि ईश्वरीय नियमों के खिलाफ है। परमपिता शिव के अनुसार भ्रष्ट कामेन्द्रियों के भोग से संतान उत्पन्न करना, भारत की योगबल द्वारा संतान उत्पत्ति की सनातन पध्दति के खिलाफ है।

ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा परमपिता शिव की श्रीमत के उल्लंघन के उदाहरण प्रस्तुत करने का उद्देश्य उनकी ख्याति को कम करना नहीं है, अपितु भगवान शिव की श्रीमत के महत्व की महसूसता कराना है, ताकि परमपिता परमात्मा शिव द्वारा स्थापित ईश्वरीय अलौकिक परिवार के नैतिक पतन को रोका जा सके और परमपिता शिव की श्रीमत के पालन से सारे विश्व को सुख-शांतिमय स्वर्ग बनाया जा सके। स्व परिवर्तन से ही विश्व परिवर्तन होगा।

ओम शांति

आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय

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